Wednesday, October 16, 2024

प्रिंसिपल-टीचर के तबादलों पर 3 घंटे में ही शिक्षा विभाग का U-Turn




आठ महीने में बार बार शिक्षा निदेशालय अपने निर्णय से पलटा है, पहले भी आदेशों पर विरोध होने पर विभाग बैकफुट पर आता दिखा है।


 बीकानेर, शिक्षा निदेशालय ने मंगलवार को तीन तबादला आदेशों में सरकारी स्कूलों के 40 प्राचार्य सहित 53 शिक्षकों के तबादला आदेश जारी कर तीन घंटे के अंदर ही आदेश प्रत्यहारित कर लिए। ऐसा बीते आठ महीने में आठवीं बार शिक्षा निदेशालय अपने निर्णय से बैकपुट पर आया है। 



ये तबादला आदेश मंगलवार को 11 बजे वायरल होने शुरू हुए। इसके बाद मंत्री किरोड़ीलाल मीणा का शिक्षा मंत्री को भेजा पत्र भी वायरल होने लगा, जिसमें तबादला आदेश वापस लेने की अपील की गई थी। इसके असर से शिक्षा निदेशालय ने दोपहर 1 बजे तीनों तबादला आदेश वापस लेने की घोषणा कर दी।



आठ महीने में आठवीं बार पलटा अपना निर्णय


1. शिक्षकों का समायोजन

प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में अधिशेष 67 हजार शिक्षकों के समायोजन के लिए 18 सितंबर से प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश जारी किए गए। कई जिला शिक्षा अधिकारियों ने इस पर काम भी शुरू कर दिया था लेकिन बाद में इस आदेश को प्रत्यहारित कर लिया गया।


2. प्रवेश की आयु : 

प्रवेशोत्सव से पहले नई शिक्षा नीति का हवाला देकर शिक्षा विभाग ने 6 साल के बच्चों को ही विद्यालयों में प्रवेश देने के आदेश जारी किए, जिससे सरकारी विद्यालयों में नामांकन की रफ्तार थम गई। शिक्षकों ने  इस आदेश का विरोध किया तो शिक्षा विभाग ने फैसला बदला और आंगनबाड़ी के पांच साल के बच्चों को प्रवेश देने का संशोधन कर दिया।



3. 100 दिन की कार्य योजना पर कायम नहीं : 

पिछले साल नवंबर में भाजपा सरकार बनने के बाद शिक्षा विभाग ने 100 दिन की कार्ययोजना तैयार जय थी जिसमें शिक्षकों की तबादला नीति तैयार करने को भी शामिल किया गया था लेकिन कुछ दिन बाद कार्ययोजना में संशोधन कर तबादला नीति वाली प्रतिबद्धता हटा दी गयी।


4. विद्यालयों को अंग्रेजी से हिंदी माध्यम : 

शिक्षा मंत्री के बयान के बाद शिक्षा विभाग ने महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों की समीक्षा करने के निर्देश जारी किए जिसके लिए 38 बिंदुओं पर सर्वे भी करवाया गया था लेकिन कुछ समय बाद अंग्रेजी से वापस हिन्दी माध्यम में करने के अपने निर्णय से पीछे हट गए।


5. दूध योजना बंद कर पुन: चालू कर दी गयी : 

नए शिक्षा सत्र से सरकारी विद्यालयों में पाउडर दूध की आपूर्ति बंद पड़ी थी। शिक्षा मंत्री ने सितम्बर में गहलोत सरकार के समय से चल रही बाल गोपाल दूध योजना में बदलाव कर स्कूलों में दूध की जगह मोटा अनाज देने की घोषणा कर दी लेकिन बाद में सरकार ने पाउडर दूध की ही सप्लाई शुरू कर दी।


6. मोबाइल पर प्रतिबंध : 

शिक्षा विभाग ने 4 मई को सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों के मोबाइल रखने पर प्रतिबंध लगाने के आदेश जारी कर किए कि लेकिन इस पर शिक्षकों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए विरोध प्रदर्शित किया। इसके बाद कुछ शर्तों के साथ शिक्षकों को विद्यालय में मोबाइल रखने की अनुमति के आदेश जारी कर दिए।


7. सेटअप परिवर्तन 6 (3) का आदेश : 

गत 17 मई को विभाग ने पंचायती राज शिक्षकों की 6 (3) कर उनके सेटअप परिवर्तन का कार्यक्रम जारी किया। इसे लेकर शिक्षकों का विरोध सामने आने पर इसे वापस ले लिया गया।


8. तबादला आदेश : 

माध्यमिक शिक्षा विभाग ने मंगलवार को 40 प्राचार्य, 8 तृतीय श्रेणी शिक्षक व पांच प्रथम श्रेणी शिक्षकों के स्थानांतरण आदेश जारी किए, इसे कुछ देर बाद वापस ले लिया गया।


पांच साल की डीपीसी लम्बित

शिक्षा विभाग में सैकंड ग्रेड शिक्षकों की पांच साल से डीपीसी लम्बित है। इसके लिए विभाग ने सूचियां भी तैयार कर ली लेकिन एक भी शिक्षक की डीपीसी नहीं हुई है। शिक्षक संगठनों ने शिक्षा मंत्री एवं निदेशक भी अनेकों बार ज्ञापन देकर डीपीसी की मांग उठाई है।



निदेशक लगाकर हटाया

गत 6 सितम्बर को राज्य सरकार के कार्मिक विभाग ने आईएएस अधिकारियों की तबादला सूची जारी की थी जिसमें माध्यमिक शिक्षा निदेशक के पद पर आईएएस डॉ. महेन्द्र खड़गावत को लगाया गया था। 
आईएएस आशीष मोदी का तबादला चूरू जिला कलक्टर के पद पर किया गया था। इसके अगले दिन डॉ. खड़गावत कार्यभार संभालने के लिए बीकानेर पहुंचे, विभाग में स्वागत की तैयारी के आदेश जारी हो गए। इसी बीच उन्हें कार्यभार ग्रहण करने से मौखिक आदेश से रोक दिया गया था। इसके 18 दिन बाद 22 सितम्बर को डॉ. खड़गावत का तबादला शिक्षा निदेशक के पद से ब्यावर कलक्टर के पद पर किया गया।


इस प्रकार राजस्थान सरकार का शिक्षा विभाग पलटू विभाग जैसा बन जाने से शाख खोता नजर आ रहा है।

Sunday, October 13, 2024

PTI 2022 भर्ती में फर्जी डिग्री से नौकरी लेने वाले अभ्यर्थियों का 14 अक्टूबर को हो सकता है फैसला



14 अक्टूबर तक दस्तावेज नहीं दिखाए तो सरकारी नौकरी पर संकट, दस्तावेज़ जांच में 321 PTI फंसे


जयपुर, PTI 2022 की परीक्षा में 321 अभ्यर्थियों पर नौकरी से हटने का खतरा मंडरा रहा है। राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड ने दस्तावेजों में हेराफेरी मानी है, इन अभ्यर्थियों को सूचित किया है कि वे 14 अक्टूबर तक अपने ORIGINAL दस्तावेज दिखावें। शनिवार व रविवार को अवकाश है, इसलिए इन अभ्यर्थियों के पास दिन 14 अक्टूबर ही शेष रहा है।

7 दिन का नोटिस दिया गया है :




अक्टूबर 2024 को राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड ने चयनित अभ्यर्थियों को अंतिम नोटिस प्रेषित कर सात दिन के अंदर ORIGINAL दस्तावेज दिखाने के लिए कहा है, इसके आभाव में अभ्यर्थियों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।

दस्तावेजों में मिली थी गड़बड़ी 


राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड ने आठ अक्टूबर को एक और नोटिस भेजा था जिसमें लिखा है कि PTI सीधी भर्ती परीक्षा 2022 में अभ्यर्थियों के मूल आवेदन पत्र में प्रशैक्षिक योग्यता प्रमाण पत्रों में विश्वविद्यालय का नाम, रोल नम्बर, एनरोलमेंट नम्बर, उत्तीर्ण वर्ष, प्रतिशत आदि में ऑनलाइन आवेदन पत्र में भिन्नता पाई गई है, इसलिए सम्बन्धित प्रमाण पत्रों की जांच के लिए विश्वविद्यालयों को पत्र लिखकर डिग्री या डिप्लोमा की जांच करवाई जा रही है, इसकी प्रतिलिपि SOG व संबंधित अभ्यर्थियों को दे दी गई है।

आवेदक मिसमैच में रख सकता है अपना पक्ष


कर्मचारी चयन बोर्ड के सचिव डॉ. बी.सी. बधाल ने अभ्यर्थियों को पुन: सूचित किया है कि आपके आवेदन में पाए गए मिसमैच प्रकरण में आपको कोई पक्ष रखना हो तो 14 अक्टूबर तक लिखित में अपना पक्ष दुर्गापुरा स्थित राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड कार्यालय में प्रस्तुत करें, अन्यथा कूटरचित प्रमाण पत्र मानते हुए सम्बन्धित के खिलाफ एक पक्षीय कार्रवाई की जाएगी इसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी अभ्यर्थियों की होगी।

Friday, October 11, 2024

राजस्थान हाईकोर्ट ने 30 साल से 'अतिरिक्त' वेतन ले रहे सरकारी कर्मचारी के खिलाफ वसूली का मामला खारिज किया, कहा- गलती विभाग ने की


राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने एक सरकारी कर्मचारी के खिलाफ जारी वसूली आदेश को रद्द कर दिया, जिसे राज्य के वित्त विभाग ने जारी किया था। कर्मचार विभाग की ओर से की गई एक गलती के कारण लगभग 30 वर्षों से अधिक वेतन प्राप्त कर रहा था। ऐसा करते हुए, हाईकोर्ट ने पाया कि कर्मचारी ने अधिक वेतन पाने के लिए विभाग को गुमराह नहीं किया था और वास्तव में गलती विभाग ने की थी।

पंजाब राज्य और अन्य बनाम रफीक मसीह (व्हाइट वॉशर) और अन्य (2015) में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए, न्यायमूर्ति विनीत कुमार माथुर की एकल न्यायाधीश पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता कर्मचारी का मामला सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में उल्लिखित मापदंडों के अंतर्गत आता है।

रफीक मसीह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ऐसी स्थितियां निर्धारित की थीं, जिनमें गलती से अधिक वेतन प्राप्त करने वाले कर्मचारियों से वसूली नहीं की जा सकती थी और ऐसी ही एक स्थिति वह थी, जहाँ वसूली आदेश जारी होने से पाँच वर्ष पहले से अधिक समय तक अधिक भुगतान किया गया था।

जस्टिस माथुर ने आगे कहा,

"इस प्रकार यह स्पष्ट रूप से सामने आता है कि याचिकाकर्ता की ओर से किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कार्रवाई या चूक के माध्यम से कोई गलत बयानी और/या छिपाव नहीं किया गया है, जिसके कारण उसे उसके हक से अधिक वेतन दिया गया। यह गलती विभाग की ओर से हुई थी और याचिकाकर्ता ने विभाग को गुमराह नहीं किया या किसी भी तरह से खुद को उससे अधिक वेतन दिलाने में योगदान नहीं दिया, जिसका उसे भुगतान किया जाना चाहिए था।"

न्यायालय एक कर्मचारी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने इस तथ्य के आधार पर वसूली शुरू की थी कि सरकारी विभाग की ओर से कुछ त्रुटि के कारण याचिकाकर्ता को उसके हक से अधिक वेतन दिया गया था।

राज्य सरकार द्वारा यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता को एक सद्भावनापूर्ण त्रुटि के तहत वेतन में अधिक राशि का भुगतान किया गया था और यह कानून में एक स्थापित स्थिति थी कि कर्मचारी को दी गई अतिरिक्त राशि, जिसका वह हकदार नहीं था, हमेशा वसूल की जा सकती है।

हालांकि, न्यायालय ने राज्य के तर्क से असहमति जताई और कहा कि राज्य ने अपने जवाब में इस बात का खंडन नहीं किया है कि याचिकाकर्ता को गलत तरीके से दिया गया लाभ 30 साल तक चला। ऐसा होने पर, यह अवधि स्पष्ट रूप से 5 वर्ष से अधिक है, जैसा कि रफीक मसीह निर्णय में उल्लेख किया गया है।

रफीक मसीह में संबंधित पैराग्राफ, जिसे हाईकोर्ट ने नोट किया है, में कहा गया है:

“कर्मचारियों को वसूली के मुद्दे पर कठिनाई की सभी स्थितियों का अनुमान लगाना संभव नहीं है, जहां नियोक्ता द्वारा गलती से उनके हक से अधिक भुगतान किया गया हो। जैसा भी हो, यहां उल्लिखित निर्णयों के आधार पर, हम एक तैयार संदर्भ के रूप में, निम्नलिखित कुछ स्थितियों का सारांश दे सकते हैं, जिनमें नियोक्ता द्वारा वसूली, कानून में अस्वीकार्य होगी:

iii) कर्मचारियों से वसूली, जब वसूली का आदेश जारी होने से पहले पांच साल से अधिक की अवधि के लिए अतिरिक्त भुगतान किया गया हो।” 

इसी के मद्देनजर हाईकोर्ट ने कहा कि "यदि कोई गलती हुई है, तो वह विभाग की ओर से है"।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित अनुपात को देखते हुए, हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य का निर्णय टिकाऊ नहीं है। इन्हीं टिप्पण‌ियों के साथ न्यायालय ने याचिका को अनुमति दी, याचिकाकर्ता के खिलाफ वसूली कार्यवाही को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता से की गई किसी भी वसूली को ब्याज सहित वापस करने का निर्देश दिया।

केस टाइटल: पूर्ण शंकर शर्मा बनाम सचिव, वित्त विभाग, राजस्थान सरकार और अन्य।

साइटेशन: 2024 लाइव लॉ (राजस्थान) 299

Featured Post

तृतीय श्रेणी शिक्षक स्थानांतरण समिति द्वारा 5 अगस्त 2026 को प्रदेश की राजधानी जयपुर में किए जा रहे आंदोलन का राजस्थान शिक्षक संघ(आज़ाद) समर्थन करता है - अरविन्द जाखड़

राजस्थान शिक्षक संघ (आज़ाद) के प्रदेशाध्यक्ष अरविन्द जाखड़ ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया है कि तृतीय श्रेणी शिक्षकों के स्थानां...

Popular Posts